दिल्ली में नज़ीब के बाद बैजल जंग

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व एलजी नजीब जंग के बीच हर फ़ैसले पर टकराव तो किसी से छुपा नहीं था. आम आदमी पार्टी के दूसरी बार दिल्ली की सत्ता में आने के बाद से ही केजरीवाल सरकार के साथ नजीब की जंग शुरू हो गई थी जो करीब 22 महीने तक जारी रही थी. लेकिन अनिल बैजल को दिल्ली के नए एलजी बने अभी मात्र दो महीने ही हुए हैं और इस दरम्यान अरविंद केजरीवाल और बैजल में चार बार टकराव के मामले आए हैं. यानि दिल्ली में सरकार और उपराज्यपाल के बीच रिश्तों में टकराव जारी है. और ये सब तब हो रहा है जब दिल्ली में MCD चुनाव सिर पर है. जहां कांग्रेस और बीजेपी जोर-शोर से अपनी तैयारियों में लगी है वहीं केजरीवाल की मुसीबतें एक के बाद एक बढ़ती ही जा रही हैं. ऐसे में विपक्ष को केजरीवाल सरकार और आम आदमी पार्टी पर हमले का मौका भी मिलता जा रहा है.

पूर्व सैनिक राम किशन ग्रेवाल की फैमिली को मुआवजा का मामला: अनिल बैजल और दिल्ली सरकार के बीच टकराव का पहला मामला सामने आया था जब उपराज्यपाल बैजल ने पूर्व सैनिक राम किशन ग्रेवाल की फैमिली को 1 करोड़ रुपए मुआवजा देने वाले केजरीवाल सरकार के प्रपोजल को खारिज करते हुए फाइल लौटा दी थी. इसके पीछे वजह बताई गई कि सुसाइड करने वाला पूर्व सैनिक दिल्ली का नहीं बल्कि हरियाणा का रहने वाला था. इसलिए दिल्ली सरकार मुआवजा नहीं दे सकती. राम किशन ग्रेवाल ने वन रैंक वन पेंशन (OROP) की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर ज़हर खा कर सुसाइड कर लिया था.

दिल्ली सरकार के ऐड देने का मामला: दोनों के बीच टकराव का दूसरा मामला तब सामने आया जब सरकारी विज्ञापनों की सामग्रियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी दिशा-निर्देशों के उल्लंघन के आरोप में एलजी ने मुख्य सचिव को आम आदमी पार्टी से 97 करोड़ रुपए वसूल करने का आदेश दिया. उपराज्यपाल ने मुख्य सचिव से यह राशि 30 दिनों के भीतर वसूलनी है. एलजी ने यह आदेश सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जांच के बाद दिया. बतौर दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ‘दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने विज्ञापन में जिस तरह से केजरीवाल को प्रोजेक्ट किया गया वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन है, इसलिए इन विज्ञापनों में जो सरकारी पैसा खर्च हुआ उसकी भरपाई आम आदमी पार्टी से 97 करोड़ रुपये वसूल करके की जाए’

एमसीडी चुनाव बैलट पेपर से कराए जाने की मांग को ठुकराया: तीसरे मामले में दिल्ली में इसी महीने होने वाले एमसीडी चुनाव में एलजी अनिल बैजल ने दिल्ली सरकार के उस प्रपोजल को ठुकरा दिया जिसमें चुनाव बैलट पेपर से कराए जाने की मांग की गई थी.

खूफिया इकाई को बंद करने का आदेश: ताज़ा मामले में दिल्ली के एलजी अनिल बैजल ने केजरीवाल सरकार की खुफिया इकाई को बंद करने का आदेश दिया है. केजरीवाल ‘फीडबैक यूनिट’ के नाम से इस इकाई को चला रहे थे. केजरीवाल सरकार बगैर एलजी की मंजूरी ही फीडबैक यूनिट को 1 करोड़ रुपए अलॉट किए थे और जांच एजेंसियों के रिटायर्ड अफसरों को शामिल किया था.

केजरीवाल सरकार ने इसका गठन सितंबर 2015 में सरकारी योजनाओं को लागू करने में निगरानी रखने और इसकी रिपोर्ट सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय को सौंपने के लिए किया था. मंत्रिमंडल की मंजूरी से गठित इस यूनिट में सेवानिवृत्त पुलिस और खूफिया अधिकारियों को तैनात किया गया था. केजरीवाल ने इसे विजिलेंस विभाग के तहत बनाया था. लेकिन विजिलेंस विभाग ने ही इसकी शिकायत सीबीआई से कर दी. सीबीआई की जांच में ही पता चला था कि खूफिया इकाई में पैसों का हेरफेर हुआ है

इसमें मज़ेद्दर बात यह था कि पिछले साल ही तत्कालीन उपराज्यपाल नजीब जंग द्वारा केजरीवाल सरकार के फैसलों की संवैधानिक वैधता को जांचने के लिये गठित शूंगलू समिति ने भी इस यूनिट के गठन को नियम के विरुद्ध बताया था.

हालाँकि, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने उपराज्यपाल के फैसले की कानूनी वैधानिकता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जनता से संवाद पर खर्च किये गये पैसे को आप से वसूलने की सिफारिश केन्द्र सरकार द्वारा गठित समिति ने अपने क्षेत्राधिकार के बाहर जाकर की है. लेकिन ऐसा लगता है कि एमसीडी चुनावों को देखते हुए केजरीवाल अपने बचाव में ये दलील दे सकते हैं कि केंद्र सरकार उन्हें बेवजह परेशान कर रही है जैसा की वो पहले भी केंद्र सरकार पर आरोप लगाते रहे है.

इन सारे उदाहरणों को देखने के बाद ऐसा प्रतीत होता है जैसे नए उप-राज्यपाल अनिल बैजल और केजरीवाल सरकार के बीच तनातनी का दौर और आगे भी जारी रहेगा लेकिन शायद इस बार जनता की राय केजरीवाल और उनकी सरकार के हक में नहीं नहीं आने वाली है. जिस तरह से अदालतें केजरीवाल पर टिप्पणी कर रही है और जितने बड़े पैमाने पर केजरीवाल सरकार के खिलाफ सबूत हैं ऐसा लगता है मानो एमसीडी चुनावों में आम आदमी शायद ही उनका साथ दे.


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